अपने ही घर से बेघर






अपने ही घर से बेघर
जिन्दगी का एक सच यह भी है कि किन्नर पैदा होते ही अपने घर से बेघर कर दिये जाते है। फिर उनके अपने ही, हिकारत भरी नजरों से बाहर का रास्ता दिखाते है। जरा सोचिये कि जिस माँ ने अपने कोख़ मे पाल पोस कर, सारे कष्ट सह कर बच्चे को जन्म दिया वही बच्चा उसे पराया लगने लगा। कारण केवल इतना की वह किन्नर है। यह पक्षपात क्यों? क्या किन्नर पैदा होना पाप है?
ऐसे मे प्रश्न उठता हैकि किन्नर होते कौन है?
जो व्यक्ति उभय लिंगी होते है अर्थात वे ना तो पुरुष होते और ना ही स्त्री, उनमे प्रजनन एवं जनन क्षमता नहीं होती है वे ही किन्नर कहलाते है। उभय लिंगी तीन प्रकार के होते है। (1)Mph पुरुष प्रधान (2)Fph महिला प्रधान (3) Thउभय लिंगी इनमें से Mph ज्यादा पाये जाते है। दूसरे शब्दों मे कहे तो हिजड़े तीन प्रकार के होते है। (1)मनसा (2)हंसा (3)बुचरा, इनमे से हंसा हिजड़ो की तादाद ज्यादा है। वर्ष 2007 तक इनके 450 धाम और इतने ही गुरु थे। गुरु इनके समूह के प्रधान होते हैं जो इनका मार्गदर्शन करते है।
कहीं-कहीं यह भी आरोप लगते है कि हिजड़े बनाये भी जाते हैं। उत्तर होगा हां- लिंगोच्छेदन कर बनाये गये हिजड़ो को छिबड़ा कहते हैं। नकली हिजड़ा बने मर्दो को अबुआ कहते हैं। अगर पुराने आकड़ो को देखे तो पता चलता है कि दिल्ली मे 30000 मे से केवल 3 हिजड़े ही जन्मजात थे। तकरीबन 12 से 14 लाख तक के हिजड़े नकली थे। एक टीवी चैनल के अनुसार हर साल 50000 किन्नर बनाये जाते हैं। इतनी संख्या के बावजूद भी आजादी के बाद से अब तक दर्जनों सरकारे बनीं लेकिन किसी ने भी इनकी सुध नही ली और ना ही सरकारी नौकरी मे कोई प्रावधान किया गया। हमारे देश मे जानवरो के लिये भी कानून है पर इनके लिये नही।
यह वही हिजड़े है जो हमारे यहां शादी-विवाह या बच्चे पैदा होने के समय दिखाई देते है। इसमे कोई दो राय नही कि पैदा होने से मरने तक जिस जिन्दगी को जीना पडता उसके विषय मे सोच कर ही डर लगता है। दूसरी तरफ समाज का दृष्टिकोण यह रहा है कि ये कुछ नही कर सकते लेकिन ये आज से नही है। इनका उल्लेख पुराणों में भी मिलता है। ऐसी कथा प्रचलित है कि दुर्योधन-पांड़वो के युद्ध का एक मोड़ ऐसा था जिसमे इनके हारने कि संभावना थी। ऐसी स्थिति में एक ही उपाय था कि किसी एक व्यक्ति की बलि मिलने पर ही युद्ध जीता जा सकता था। इस कार्य के लिये अर्जुन के पुत्र अरवान को कहा गया और उसने सहर्ष स्वीकृति दी लेकिन एक शर्त थी कि वह विवाह करना चाहता था और युद्ध एक दिन पश्चात ही था। यह जानकर कि वह एक दिन पश्चात ही मर जाएगा कोई लड़की उससे शादी के लिये तैयार नही हुई। अन्त मे भगवान कृष्ण ने अर्ध नारी का रुप धारण किया और विवाह संपन्न हुआ। दूसरे दिन अरवान युद्ध मे मारा गया पुन: कृष्ण ने अपना वास्तविक रुप धारण कर लिया। भगवान राम के समय मे भी इनके प्रमाण मिलते है। उसी समय को ये अपना वास्तविक समय मानते है। जब यह बात सत्य है कि यह हमारे समाज का अभिन्न अंग है तो ऐसा व्यवहार क्यो?
हिजड़ा कल्याण हेतु 4 नवंबर 1983 को अखिल भारतीय हिजड़ा कल्याण सभा कि स्थापना की गई। लेकिन वह स्थापना केवल स्थापना ही बनकर रह गई। आज तक कोई ऐसी खबर नही जिसमें इनके शिक्षा, रोजगार, आवास के विषय में कोई उल्लेख हो। जब किसी बच्चे का पालन पोषण उचित वातावरण में ना हो तो वह उद्दंड़ होता है वैसे यह जरुरी नही कि ऐसा हो। फिर हम इनसे कुशल व्यवहार की आशा करे। हमें चाहिये कि हम इनके प्रति अपना नजरिया और दृष्टिकोण बदले ताकि ये भी हमारे समाज मे एक कुटुम्ब कि भांति रह सके और अपने को इस समाज का हिस्सा समझे।

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