भाषाई दल-दल में उलझी राजनीति
भाषाई दल-दल में उलझी राजनीति
कृष्ण कुमार तिवारी
राजनीतिक ला
भों हेतु क्या देश के साथ किसी भी प्रकार का खिलवाड़ किया जा सकता है? यदि उत्तर नहीं है तो फिर राज ठाकरे या उनकी पार्टी किस एकता का परिचय दे रही है? राष्ट्रभाषा कही जाने वाली भाषा हिन्दी के साथ इतना घृणापूर्ण व्यवहार आखिर ऐसा क्यों? भाषा एवं क्षेत्रीयता आधारित राजनीति कुऐं में टर्राते मेंढक के समान है जो कुऐं में रहकर खूब उछलकूद करता है लेकिन वह केवल और केवल उसी कुऐ भर का रह जाता है। इस बात की शिक्षा राज ठाकरे को अपने चाचा बाला साहेब ठाकरे से लेनी चाहिए। हिंदी से इतनी घृणा कि फिल्म में मुबंई के स्थान पर बंबई होने पर कभी करण जौहर को राज से माफी मांगनी पड़ती है तो कभी उद्धव अनुसार मराठी मानुष से माफी मांगते हैं। वैसे यह घटना पहली नहीं है इससे पहले मणिरत्नम की फिल्म बांबे के लिए उन्हें बाला साहेब ठाकरे के घर मातो जाकर मांफी मांगनी पड़ी थी। उत्तर भारतीय के खिलाफत फिर हिंदी के प्रति विद्रोह यह सारी ओछी राजनीति या कहें विभाजनकारी राजनीति की निशानी है क्योंकि आज जो महाराष्ट्र में हो रहा है यदि वह सारे देश में चालू हो जाए तो राज ठाकरे खुद कहां जायेंगें? क्योंकि दूसरे प्रदेशों में उत्तर भारतीयों की तरह मराठी मानुष को पीटकर वापस महाराष्ट्र में भेजा जायेगा फिर राज ठाकरे जो इतन शुभचिंतक है मराठी मानुष के वे सारे मानुष को अपने घर में जगह देंगे क्योंकि उनसे मराठी मानुष का दुःख देखा नहीं जाता। राज ठाकरे यह भूल रहे हैं यही हिंदी थी और यही उत्तर भारत था जिसके द्वारा कभी न डूबने वाले राज का सूरज डूबा दिया था। यहीं सारे बड़े-बड़े आंदोलन खड़े हुए जिनकी बदौलत आज देश आजाद है। लेकिन आजादी के 62 वर्ष के बाद भी देश को पुनः टुकड़ो में बांटने की कोशिश की जा रही है।पिछले दो जनगणनाओं के अनुसार आबादी की वृद्धि दर महाराष्ट्र में 2।62, सूरत में 6।16, पटना में वृद्धि दर 4.40 तथा सबसे तेज बढ़ती दिल्ली जिसकी वृद्धि 4.18 है। ऐसे में देखा जाए तो पायेंगे कि महाराष्ट्र के दुगने की दर से पटना की जनसंख्या बढ़ रही है। बंबई पर अपना हक जताने वाले शायद बंबई के इतिहास से परिचित नहीं है। बंबई का पुराना नाम बोम् बइया था जो कि पुर्तगालियों द्वारा रखा गया था। जिसका अर्थ था अच्छी घाटी। बंबई का विकास सात द्वीपों की दलदली भूमि से हुआ जिस पर 1654-1661 तक पुर्तगालियों का शासन था। यह बंबई इंग्लैंड़ के बादशाह चार्ल्स द्वितीय को दहेज के रुप में मिला था। बादशाह ने दस पौंड़ के वार्षिक कर पर ईस्ट इंडिया कंपनी को सन् 1669 में दे दिया। 1818 में पेशवा शासन के अंत के बाद अंग्रेजों ने सारे दक्षिणी पठार पर अधिकार कर बंबई का विकास किया बंबई के विकास में जिनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान था उनमें जमशेद जीजी भाई, प्रेमचंद्र रायचंद्र, भाऊदाजी लाड़, दादा भाई नेरौजी इत्यादि थे। इनमें से केवल एक महाराष्ट्रियन जांभेकर को छोड़कर सभी हिंदी भाषी थे। नाना शंकर जिनका विकास में विशेष योगदान था वह गुजराती थे।भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नाना शंकर सेठ 12 साल तक अध्यक्ष रहे। इन्हीं के द्वारा 1845 में स्थापित एल.फिस्टन.कॉलेज और 1857 में बंबई विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। शिवाजी और पेशवा मराठा साम्राज्य का उत्तराधिकारी होने का दावा करने वाली शिवसेना या मनसे यह भूल गयी हैं कि वे खुद उत्तर भारत के हैं। बाला साहेब ठाकरे के पिता जो बड़े लेखक और खोजी इतिहासकार थे यह बता गए कि ठाकरे यानि चंद्रसेन कायस्थ प्रभु बिहार से आए थे। चंद्रगुप्त मौर्य के पूर्वज पाटिलिपुत्र सम्राट महापदमनंद (शूद्र) के कुकृति से संतृप्त होकर वहां से भागे और महाराष्ट्र में आकर बसे। इस प्रकार से तो ये मूलतः बिहारी हैं फिर ये उत्तर भारतीय होने के नाते कैसे मराठी मानुष के हित की बात कर सकते हैं। फिर इन्हें भी मराठी मानुष को महाराष्ट्र से खदेड़ बाहर कर देना चाहिए। चर्चिल ने शायद इन्हीं परिस्थितयों को सोचकर कहा होगा कि भारतीय शासन करना नहीं जानते और इनकी आजादी होने में इनकी ही बरबादी है और इसी का उदाहरण है अबू आजमी को मनसे के विधायकों के द्वारा हिंदी में शपथ लेते समय चांटा मारा जाना। हकीकत तो यह कि बंटवारे की राजनीति आपको ही आपको ही अकेला छोड़ देगी और राज ठाकरे का भी वही हाल होगा जो बाला साहेब ठाकरे का हुआ है या हो रहा है। एक समय बाद जनता खुद जानेगी और इसका खुद प्रतीकात्मक उत्तर देगी।
भों हेतु क्या देश के साथ किसी भी प्रकार का खिलवाड़ किया जा सकता है? यदि उत्तर नहीं है तो फिर राज ठाकरे या उनकी पार्टी किस एकता का परिचय दे रही है? राष्ट्रभाषा कही जाने वाली भाषा हिन्दी के साथ इतना घृणापूर्ण व्यवहार आखिर ऐसा क्यों? भाषा एवं क्षेत्रीयता आधारित राजनीति कुऐं में टर्राते मेंढक के समान है जो कुऐं में रहकर खूब उछलकूद करता है लेकिन वह केवल और केवल उसी कुऐ भर का रह जाता है। इस बात की शिक्षा राज ठाकरे को अपने चाचा बाला साहेब ठाकरे से लेनी चाहिए। हिंदी से इतनी घृणा कि फिल्म में मुबंई के स्थान पर बंबई होने पर कभी करण जौहर को राज से माफी मांगनी पड़ती है तो कभी उद्धव अनुसार मराठी मानुष से माफी मांगते हैं। वैसे यह घटना पहली नहीं है इससे पहले मणिरत्नम की फिल्म बांबे के लिए उन्हें बाला साहेब ठाकरे के घर मातो जाकर मांफी मांगनी पड़ी थी। उत्तर भारतीय के खिलाफत फिर हिंदी के प्रति विद्रोह यह सारी ओछी राजनीति या कहें विभाजनकारी राजनीति की निशानी है क्योंकि आज जो महाराष्ट्र में हो रहा है यदि वह सारे देश में चालू हो जाए तो राज ठाकरे खुद कहां जायेंगें? क्योंकि दूसरे प्रदेशों में उत्तर भारतीयों की तरह मराठी मानुष को पीटकर वापस महाराष्ट्र में भेजा जायेगा फिर राज ठाकरे जो इतन शुभचिंतक है मराठी मानुष के वे सारे मानुष को अपने घर में जगह देंगे क्योंकि उनसे मराठी मानुष का दुःख देखा नहीं जाता। राज ठाकरे यह भूल रहे हैं यही हिंदी थी और यही उत्तर भारत था जिसके द्वारा कभी न डूबने वाले राज का सूरज डूबा दिया था। यहीं सारे बड़े-बड़े आंदोलन खड़े हुए जिनकी बदौलत आज देश आजाद है। लेकिन आजादी के 62 वर्ष के बाद भी देश को पुनः टुकड़ो में बांटने की कोशिश की जा रही है।पिछले दो जनगणनाओं के अनुसार आबादी की वृद्धि दर महाराष्ट्र में 2।62, सूरत में 6।16, पटना में वृद्धि दर 4.40 तथा सबसे तेज बढ़ती दिल्ली जिसकी वृद्धि 4.18 है। ऐसे में देखा जाए तो पायेंगे कि महाराष्ट्र के दुगने की दर से पटना की जनसंख्या बढ़ रही है। बंबई पर अपना हक जताने वाले शायद बंबई के इतिहास से परिचित नहीं है। बंबई का पुराना नाम बोम् बइया था जो कि पुर्तगालियों द्वारा रखा गया था। जिसका अर्थ था अच्छी घाटी। बंबई का विकास सात द्वीपों की दलदली भूमि से हुआ जिस पर 1654-1661 तक पुर्तगालियों का शासन था। यह बंबई इंग्लैंड़ के बादशाह चार्ल्स द्वितीय को दहेज के रुप में मिला था। बादशाह ने दस पौंड़ के वार्षिक कर पर ईस्ट इंडिया कंपनी को सन् 1669 में दे दिया। 1818 में पेशवा शासन के अंत के बाद अंग्रेजों ने सारे दक्षिणी पठार पर अधिकार कर बंबई का विकास किया बंबई के विकास में जिनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान था उनमें जमशेद जीजी भाई, प्रेमचंद्र रायचंद्र, भाऊदाजी लाड़, दादा भाई नेरौजी इत्यादि थे। इनमें से केवल एक महाराष्ट्रियन जांभेकर को छोड़कर सभी हिंदी भाषी थे। नाना शंकर जिनका विकास में विशेष योगदान था वह गुजराती थे।भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नाना शंकर सेठ 12 साल तक अध्यक्ष रहे। इन्हीं के द्वारा 1845 में स्थापित एल.फिस्टन.कॉलेज और 1857 में बंबई विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। शिवाजी और पेशवा मराठा साम्राज्य का उत्तराधिकारी होने का दावा करने वाली शिवसेना या मनसे यह भूल गयी हैं कि वे खुद उत्तर भारत के हैं। बाला साहेब ठाकरे के पिता जो बड़े लेखक और खोजी इतिहासकार थे यह बता गए कि ठाकरे यानि चंद्रसेन कायस्थ प्रभु बिहार से आए थे। चंद्रगुप्त मौर्य के पूर्वज पाटिलिपुत्र सम्राट महापदमनंद (शूद्र) के कुकृति से संतृप्त होकर वहां से भागे और महाराष्ट्र में आकर बसे। इस प्रकार से तो ये मूलतः बिहारी हैं फिर ये उत्तर भारतीय होने के नाते कैसे मराठी मानुष के हित की बात कर सकते हैं। फिर इन्हें भी मराठी मानुष को महाराष्ट्र से खदेड़ बाहर कर देना चाहिए। चर्चिल ने शायद इन्हीं परिस्थितयों को सोचकर कहा होगा कि भारतीय शासन करना नहीं जानते और इनकी आजादी होने में इनकी ही बरबादी है और इसी का उदाहरण है अबू आजमी को मनसे के विधायकों के द्वारा हिंदी में शपथ लेते समय चांटा मारा जाना। हकीकत तो यह कि बंटवारे की राजनीति आपको ही आपको ही अकेला छोड़ देगी और राज ठाकरे का भी वही हाल होगा जो बाला साहेब ठाकरे का हुआ है या हो रहा है। एक समय बाद जनता खुद जानेगी और इसका खुद प्रतीकात्मक उत्तर देगी। 
mumbaee ki achhi jankari, swagat.
ReplyDeleteji hriday se aabhar
Deleteके के-- तुम्हारी जानकारी बहुत कम व अधूरी है, बम्बई का नाम पुर्तगालिओ ने नहीं, वह मुम्बा देवी के कारण वास्तव में उसका नाम --मुम्बई ही है,जो बिगड कर बम्बई हुआ। जैसे कलकत्ता--काली-देवी से। अन्ग्रेज़ी राज का सूर्य केवल उत्तर भारतीयों के कारण ही नहीं डूबा, समस्त भारत की एकता के कारण, गान्धी, तिलक, गोखले,लाज्पत राय,भगत, आज़ाद,पाल,सुभाष,राज्गोपालाचार्य--पूरे हिन्दुस्तान के थे। जोश में होश नहीं खोने चाहिये। टिप्पणी करने वालोण की क्या बगैर सोचे समझे बहुत अच्छी जानकारी कह देते हैं। हिन्दी के बारे मेण गलती केन्द्र सरकार की है --क्यों नहीं अभी तक हिन्दी को सम्विधानिक-राष्ट्र- भाषा घोषित करती है,इसीलिये ऐसे क्रित्य उठ खडे होते हैं।
ReplyDeleteitni faltoo article ka is tarah ke blog me hona its just disgusting aap ke nakara patrakar hai aur iss baat ko aap jitne jaldi maan le aapke liye utna hi behtar hoga aur meri maane to patrakarita chhod kisi sarkari hospital me compounder ban jaiye wahi aapke liye behtar hai...
ReplyDeleteetna aacha reply ke liye thank but kya aap ye bta skte etni aachi jankari aap kha se he ki me patrkarita kr rha hu kher koi bat nhi khte jo dusro ke liye jesa sochta he bhgwan usko pehle wesa dete he eska result aap ko khud mil rha hoga again thank
ReplyDeleteKrishna ji aap ne bahut achha likha hai, mai aapke ish artical ke liye badai deti hu. or aap dusre ke kehne per mat jaye or acche artical likhe. or aap ke artical ke liye jaisa ki aishwarya ji ne likha ki aap patrkarita chod ke govt. hospital join kar le" tho mai apko ye bata do ki bharat hamara swatantr desh hai subko swatantr soachne ka aadikar hai. tho mai aiswarya ji se ye kehna chahungi ki itni sourse hai unki sarkari hospital mai tho vo khud kyo aya ki post join kyo nahi kar leti hai. Sorry for any mistake this comments thanks.
ReplyDeleteji jarur
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