बुरके पर बहस क्यों

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और वह समाज में रहना चाहता है। ऐसा शायद सभी ने समाज में रहने के संबंध में बहुत बार पढ़ा होगा। लेकिन आज के दौर को देखते हुए कहीं ना कहीं इस परिभाषा को बदलने की जरुरत नजर आती है क्योकि समाज का वास्तविक अर्थ तो समाज या कहे हमारे आस पास रहने वाले लोगों के बीच में रहना, उनसे संवाद करना, हर उसको जानना जो हमे जानना चाहता है लेकिन यह बात महिलाओं के लिये भी लागू हो ऐसा यह पुरुष प्रधान समाज के गले नही उतरती ।
यदि कल्पना करें कि किसी पुरुष को पूरे दिन किसी कपड़े से अपने आप को ढ़क कर घुमना हो तो उसे कैसा महसूस होगा। लेकिन हम तो केवल दुसरों पर आदेश थोपना जानते हैं लेकिन जब बात खुद पे आती है तो कतराने लगते है। किसको क्या पसंद है, कौन क्या करना चाहता है, कैसे रहना चाहता है, इसकी स्वतंत्रता उसकी खुद की होती है। किसी को कोई हक नहीं होता कि वह किसी को किसी भी प्रकार की बंधिश लगाए।
आज सारा विश्व विकाश की राह पर दौड़ मचाए हुए है। जहां केवल पुरुष ही नही बल्कि महिलाएं भी अपनी अलग पहचान बना रही हैं और ऐसे मे यह पर्दा क्या उनके विकास मे एक रुकावट नहीं होगा ? कहते है परिवर्तन ही संसार का नियम है। यह भी बात सही है कि परिवर्तन उसी हद तक होना चाहिए जहां तक किसी को कोई परेशानी ना हो। वैसे गौर करें तो हिन्दु समाज में भी पर्दा प्रथा थी और कई घरों में आज भी चल रही है। आज हम जहां महिला विकास या महिला आरक्षण की बात करते है उसका केवल और केवल एक कारण कि महिलाएं भी इस विकास की दौड़ में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलें तो क्या कारण है कि एक मंत्री का बयान धर्म के ठेकेदारों को इतना बुरा क्यों लग रहा है। यह बात है उस नारी की जिसको इसी पर्दे के कारण अबला के खिताब से नवाज़ा जाता है।
पहले समय में सुरक्षा कारणों से बना बुर्का आज अनिवार्य पहनावे में बदल चुका है। अरब देशों में कबीलाई हमलों से बचाने के लिए वहां बुर्के का प्रयोग होता था। यहां डां एच.एम.एस. जैदी के कथन का उल्लेख करना अनिवार्य लगता है। उनके अनुसार शिया समुदाय में पर्दे का अर्थ है सिर ढ़का हो और अंग प्रदर्शन की गुजाईश ना हो। आज ईरान जैसे देश में नब्बे फीसदी महिलाएं दफ्तरों मे काम कर रही है और यहां तक की रिक्शा भी चला रही हैं। उन्होने कहा कि सिर ढ़कने के बाद महिलाएं गले से लेकर पैर तक की विशेष पोशाक पहनती हैं और यही पर्दा है।
मक्का-मदीना की मस्जिदों के इमाम की बेटियां तो अमेरिका में पढ़े, लेकिन आम भारतीय मुसलमान की बेटी को दिल्ली युनिवर्सिटी या लखनऊ युनिवर्सिटी की पढ़ाई भी नसीब ना हो पाए? यह कहां का इंसाफ है ? हमें चाहिये कि हम इस पहल में आगे बढ़े और इस रुढ़ीवादिता को समाज से निकाल फेके तभी हमारे देश की मुस्लिम महिलाएं भी अपना नाम रोशन कर दिखाऐगी।
यदि कल्पना करें कि किसी पुरुष को पूरे दिन किसी कपड़े से अपने आप को ढ़क कर घुमना हो तो उसे कैसा महसूस होगा। लेकिन हम तो केवल दुसरों पर आदेश थोपना जानते हैं लेकिन जब बात खुद पे आती है तो कतराने लगते है। किसको क्या पसंद है, कौन क्या करना चाहता है, कैसे रहना चाहता है, इसकी स्वतंत्रता उसकी खुद की होती है। किसी को कोई हक नहीं होता कि वह किसी को किसी भी प्रकार की बंधिश लगाए।
आज सारा विश्व विकाश की राह पर दौड़ मचाए हुए है। जहां केवल पुरुष ही नही बल्कि महिलाएं भी अपनी अलग पहचान बना रही हैं और ऐसे मे यह पर्दा क्या उनके विकास मे एक रुकावट नहीं होगा ? कहते है परिवर्तन ही संसार का नियम है। यह भी बात सही है कि परिवर्तन उसी हद तक होना चाहिए जहां तक किसी को कोई परेशानी ना हो। वैसे गौर करें तो हिन्दु समाज में भी पर्दा प्रथा थी और कई घरों में आज भी चल रही है। आज हम जहां महिला विकास या महिला आरक्षण की बात करते है उसका केवल और केवल एक कारण कि महिलाएं भी इस विकास की दौड़ में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलें तो क्या कारण है कि एक मंत्री का बयान धर्म के ठेकेदारों को इतना बुरा क्यों लग रहा है। यह बात है उस नारी की जिसको इसी पर्दे के कारण अबला के खिताब से नवाज़ा जाता है।
पहले समय में सुरक्षा कारणों से बना बुर्का आज अनिवार्य पहनावे में बदल चुका है। अरब देशों में कबीलाई हमलों से बचाने के लिए वहां बुर्के का प्रयोग होता था। यहां डां एच.एम.एस. जैदी के कथन का उल्लेख करना अनिवार्य लगता है। उनके अनुसार शिया समुदाय में पर्दे का अर्थ है सिर ढ़का हो और अंग प्रदर्शन की गुजाईश ना हो। आज ईरान जैसे देश में नब्बे फीसदी महिलाएं दफ्तरों मे काम कर रही है और यहां तक की रिक्शा भी चला रही हैं। उन्होने कहा कि सिर ढ़कने के बाद महिलाएं गले से लेकर पैर तक की विशेष पोशाक पहनती हैं और यही पर्दा है।मक्का-मदीना की मस्जिदों के इमाम की बेटियां तो अमेरिका में पढ़े, लेकिन आम भारतीय मुसलमान की बेटी को दिल्ली युनिवर्सिटी या लखनऊ युनिवर्सिटी की पढ़ाई भी नसीब ना हो पाए? यह कहां का इंसाफ है ? हमें चाहिये कि हम इस पहल में आगे बढ़े और इस रुढ़ीवादिता को समाज से निकाल फेके तभी हमारे देश की मुस्लिम महिलाएं भी अपना नाम रोशन कर दिखाऐगी।


"krishna ji aapne jo artical(Burke per bahas kyo) likha hai bahut hi accha likha hai.or apne ye bhi likha ki hamara desh ek purush pradhan desh hai jha mahilao ko kandhe se kandha milakerchalne ki bat kahi hailekin aaj bhi bahut si jagaho per mahilaye ish parda pratha ka palan kar rahi hai, or apne ye bhi likha hai ki ish rudivadita ko samaaj se nikal kar fak dena chahiye ,lekin jha tak mera manna hai ki iski pehal un mahilao ko hi karni hogi. kyoki apne huk ke liye ladna ya aage badna koi galat baat nahi hai. sorry for any mistake in this comment
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